होली है..!

छुट्टी का दिन था तो अलार्म लगाए बिना ही सो गया था मैं कल रात, मोहल्ले के बच्चों का शोर सुन मेरी नींद टूट गयी। खिड़की से झाँक कर देखा तो सब एक दूसरे को रंग लगा रहे थे।

अरे! आज तो होली है, आँखों को रगड़ते हुए मैंने सोचा। पानी पीकर वापस बिस्तर पर जा कर बैठ गया और सोचने लगा कि अब कहाँ रहे वो पहले जैसे दिन, दोस्त सब बिछड़ गए, घर से दूर, होली भी हर साल पहले से और बेरंगी होती जा रही है। मिलना तो दूर अब तो फोन पर बातें भी नहीं हो पाती किसी से, सब एक दूसरे को व्हाट्सएप कर देते हैं बस। वो मिलना मिलाना, हँसना खेलना तो बस सपनों सा लगता है। अब ये हाल है कि कोई कहीं है तो कोई किसी और काम मे उलझा हुआ, किसी को आफिस से छुट्टी नहीं तो कोई घर संभालने में लगा हुआ।

मैं उठकर फिर खिड़की से बच्चों को खेलता देखने लगा, कितना प्यारा दृश्य था वह। अपने स्कूल के दिनों की याद आ गयी मुझे, कैसे मैं होली खेला करता था, कैसे दोस्तों के साथ मिल पूरा दिन सब कुछ छोड़ कर मस्ती किया करता था। कितना हसीन होता है ये बचपन।
आज भी याद है वो पुराने होली के दिन मुझे…

सुनहरी सी सुबह लगती थी, नीला आसमान, रंगों का त्योहार, रंग लगा अपने प्यार का इज़हार करने का त्योहार। मैं सुबह जल्दी उठ जाया करता था और छत पर जाकर आसमान को घूरने लगता था, ऐसा लगता था पूरा आसमान ही इंद्रधनुष सा रंग बिरंगा हो जैसे। गुजियाँ, जो माँ बनाया करती थी, उसकी खुशबू से पूरा घर महक जाया करता था। धीरे-धीरे सारे दोस्त अपने-अपने हाथों में रंग लिए छत पर आ जाते थे, फिर हम फैसला करते थे किसे निशाना बनाना है इस बार। छत पर चारों ओर हम रंग से भरे गुब्बारे या पिचकारी लिये तैयार हो जाते थे और फिर कौन कितने शिकार बनाता है ये जंग शुरू हो जाती थी। पूरा दिन खेलना, खाना और मस्ती में कब चला जाता था पता ही नहीं चलता था।


मोहल्ले के बच्चों की खुशियों में ही अपने होली के रंग तलाशता हुआ मैं कुछ देर और वही खड़ा रहा और अपने बीते दिन याद करता रहा।

पहली डेट: कहानी दो दोस्तों की

सुहानी शाम थी, रितेश और तृप्ति एक दूसरे से साथ गोआ में समंदर किनारे बैठे थे। वो शाम उन दोनों के लिए बहुत खास थी। थोड़ी अलग, थोड़ी अजीब सी शाम, पर फिर भी प्यारी। समंदर की लहरों से आता हुआ पानी उन दोनों के पैरों को छूकर वापस चला जाता, पानी और उनके बीच का ये सिलसिला काफी देर तक चलता रहा।

रितेश और तृप्ति एक दूसरे के बहुत अच्छे दोस्त थे, वो साथ में, एक ही स्कूल, एक ही क्लास में पढ़ा करते थे। इसलिए उन दोनों की दोस्ती बहुत गहरी थी, दोनों एक दूसरे को समझते थे।

बीच पर बैठे दोनों बातें कर रहे थे, तभी:
रितेश बोला, ” तुतू, हम एकदूसरे को कितने सालों से जानते हैं, समझते हैं, बहुत अच्छा लगता है जब तुम और मैं ऐसे साथ में होते हैं, तुम्हें नहीं लगता कि अब हम सिर्फ दोस्त नहीं हैं, उस से थोड़ा बढ़कर हैं।”
तृप्ति ने बोला, ” आई नो डिअर! तुम बहुत खास हो मेरे लिए और मैं नहीं चाहती कि हमारा ये प्यारा से रिश्ता खराब हो।”
रितेश ने उसे समझाते हुए बोला,” अरे तुतू, समझो, हम न लड़ते हैं, न कभी एक दूसरे से बात किये रहते हैं और कुछ भी होता है तो वो बात तुम सबसे पहले मुझे बताती हो, है ना? इसका मतलब समझ रही हो न!”
तृप्ति बोली, ” हाँ, कुछ भी होता है तो मैं तुमसे ही शेयर करती हूँ, क्यूँकि तुम, अच्छे से समझते हो मुझे।”
“वही तो मैं कह रहा हूँ”, रितेश बोला।
तृप्ति थोड़ा सा शरमाई और हल्के से मुस्कुराते हुए बोली, “तो हमें क्या करना चाहिए?”

तृप्ति की मुस्कुराहट में रितेश को इकरार साफ दिख रहा था, दोनों ने डेट पर जाने का फैसला लिया। यूँ तो दोनों काफी बार एक दूसरे से साथ बाहर गए थे, पर दोस्तों की तरह। ये पहली बार था कि वो दोनों लवर्स की तरह डेट पर जाएँगे। अगला दिन आया, रितेश पहली बार तैयार होते समय घबरा रहा था, उसे पहली बार ये फिक्र हो रही थी कि वो अच्छा तो लग रहा है ना। बार बार अपने आप को शीशे में देख वो बालों पर हाथ फेरता और उन्हें ठीक करने लगता। तृप्ति का भी दिल ज़ोर ज़ोर से धडक रहा था, उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि वो क्या पहनें, कैसे तैयार हो। इस से पहले तो वो रितेश से मिलने यूँही आ जाय करती थी बिना ये फिक्र किये की वो कैसी लग रही है, क्या पहनी है, लेकिन आज के दिन उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि वो कैसे तैयार हो। जैसे तैसे उसने अपने दिल और दिमाग पर काबू पाया और तैयार होकर डेट वाली जगह पहुँच गयी।

जगह तृप्ति ने ही चुनी थी, उसे समंदर किनारे, बीच पर जाना बहुत अच्छा लगता था, इसलिए उसने ऐसा होटल चुना जो एकदम समन्दर किनारे था। वहाँ पहुंचकर वो समुद्र की लहरों की आवाज़ में खो गयी, आज उसे वो आवाज़ किसी मधुर संगीत से कम नहीं लग रही थी। इतने में रितेश भी आ गया और तृप्ति के सामने जाकर बैठ गया, तृप्ति इतनी खो गयी थी कि उसे रितेश के आने का पता ही नहीं चला। रितेश चुपचाप उसे देखता रहा, वो चाहता था कि ये पल यहीं रुक जाए और वो तृप्ति को ऐसे ही देखता रहे। तभी ज़ोर से ठंडी हवा आयी और तृप्ति का ध्यान तोड़ गयी। तृप्ति ने रितेश को अपने सामने देखा तो वो खड़ी हुई और रितेश के गले लग गयी। रितेश बोला, “सॉरी वो थोड़ा देर हो गयी…” “मेरे ऐसे ही पास रहो और इस पल को महसूस करो”, तृप्ति ने रितेश की बात काटते हुए कहा।

दोनों फिर एक दूसरे में ऐसे ही खोए रहे और वो पहली डेट उन्होंने अपने दोस्ती से लेकर प्यार तक के सफर के नाम कर दी।

वो सफर रेलगाड़ी का

बात है पिछले साल की दीवाली की, रोहित ने अपने काम से छुट्टी पहले ही ले ली थी। उसे दीवाली पर अपने घर जो जाना था। उसने सारी तैयारियां बहुत पहले से ही कर ली थीं जैसे रेलगाड़ी का रिज़र्वेशन, अपने बॉस से छुट्टी की बात, दीवाली के लिए नए कपड़े लेना इत्यादि। वो बेहद खुश भी था क्यूँकि वो बहुत सालों के बाद अपने घरवालों के साथ दीवाली मनाने जा रहा था।

सारी तैयारियाँ तो रोहित पहले से ही कर चुका था इसलिए अब उसे कुछ खास फिक्र करने की ज़रूरत नहीं थी। अपना सामान लेकर वो ऑटो में बैठ समय पर स्टेशन पहुँच गया। उसने स्टेशन पर लगी टेलीविजन पर देखा कि उसकी गाड़ी प्लेटफार्म न. 2 पर खड़ी हुई है। रोहित झटपट जाकर रेलगाड़ी में बैठ गया, उसे नीचे की सीट मिली थी, समान सीट के नीचे रख वो खिड़की से पास जाकर बैठ गया और रेलगाड़ी के चलने का इंतज़ार करने लगा। थोड़ी ही देर में रेलगाड़ी के इंजिन की आवाज़ रोहित के कानों में पड़ी और गाड़ी धीरे-धीरे चलने लग गई। रोहित बाहर के नज़ारों का लुत्फ लेने लग गया।

थोड़ी ही देर में एक लड़की हाँफते हुए आई और रोहित की सीट पर बैठ गयी। उसने खुद से ही बोला, “थैंक गॉड, आखिर जगह मिल ही गयी। लगा था आज तो ट्रैन मिस ही हो जाएगी।” रोहित ने उसकी ओर देखा तो वो बोली, “ये सीट आपकी है क्या?” रोहित ने बोला, “जी हाँ, तभी तो यहाँ बैठा हूँ।” लड़की बोली,” बढ़िया, मेरी वो सामने वाली ऊपर की सीट है। क्या में यहाँ बैठ सकती हूँ?” रोहित बोला, “जी हाँ, क्यूँ नहीं।” लड़की ने मुस्कुरा कर बोला, “शुक्रिया! आपका।” रोहित फिर रेलगाड़ी से बाहर झाँकने लगा। उस लड़की ने फिर बोला, “लो मैंने आपसे आपका नाम तो पूछा ही नहीं, क्या नाम है आपका?” रोहित ने उसे अपना नाम बताया और उससे उसका नाम पूछा। उस लड़की ने अपना नाम रिया बताया। नाम सुनकर रोहित बोला, “बहुत अच्छा नाम है आपका।” रिया ने हँसते हुआ कहा, “है ना! मुझे भी अपना नाम बहुत अच्छा लगता है।” रोहित ने उसकी ओर देखा और ज़रा सा मुस्कुरा दिया।

जैसे जैसे समय बीत ता गया रोहित को वो लड़की बहुत पसंद आने लगी। उसका बेबाक बोलने का अंदाज़, उसकी मुस्कराहट, उसका वो बालों को सहलाना। ये सब मन ही मन रोहित सोच ही रहा था कि रिया ने फिर बोली, “रोहित, सुनो दिल्ली अभी बहुत दूर है, मुझसे ऐसे चुपचाप बैठ कर सफर नहीं हो पाता।” रोहित बोला, ” तो कैसे किया जाता है सफर?” रिया बोली, कुछ बोलो, बात करो, अपने बारे में बताओ नहीं यो मेरा सुनो या कुछ खेलेते हैं। फिर रोहित ने कहा, “यहाँ इस रेलगाड़ी में और भी लोग हैं क्या पता उनको शांति से जाना हो” रिया बोली, “उनको या तुमको। खैर ठीक है, सुन तो सकते हो। मैं बताती हूँ आज ये ट्रैन मुझसे छूट ही जाती, चलती रेलगाड़ी में कभी चढ़े हो? नहीं चढ़े होंगे आज मैंने किया ये कारनामा।” और फिर रिया घंटो तक बोलती रही और रोहित उसे चुपचाप सुनता रहा। रोहित तो उसका बात करना बहुत अच्छा लग रहा था, रिया की आवाज़ इतनी प्यारी थी कि रोहित को सब अच्छा लग रहा था। वो तो खो ही गया था रिया की बातों में।

रिया को भी जैसे कोई सुनने वाला मिल गया, वो रोहित से बात करके बहुत अच्छा महसूस कर रही थी, क्यूँकि ऐसा पहली बार था कि उसे किसी ने बीच में टोका नहीं। जाने अनजाने में दोनों को एक सफर में हमसफर मिल जाएगा ये किसी ने भी नहीं सोचा था।

रास्ते मेरे सारे जाते हैं तेरी ओर ही,
जैसे उन्हें पता हो, तू ही मंज़िल है मेरी।

एक प्रेम कहानी ऐसी भी

साकेत और रीमा कॉलेज में एक ही क्लास में पढ़ते थे, कुछ ही समय में वो दोनों बहुत अच्छे दोस्त भी बन चुके थे। उन दोनों के विचार भी एक दूसरे से मिलते जुलते थे जैसे कि उनका रिलेशनशिप स्टेटस- ‘सिंगल’। जी हाँ, दोनों ही सिंगल थे। यूँ तो साकेत रीमा को चाहता था, ये उसका पहला पहला प्यार था, पर उसमें इतनी हिम्मत न थी कि वो अपने दिल की बात बता पाए।

लेकिन रीमा पहले सिंगल नहीं थी, इस कॉलेज में दाखिला लेने से पहले वो एक लड़के आशीष के साथ प्रेम संबंध में थी, हालाँकि, अब ऐसा नहीं था, अब रीमा, आशीष से अलग हो चुकी थी और ये बात साकेत को पता थी। इसलिए वो थोड़ा हिचकिचाता था अपने दिल का हाल बताने से। उसे लगता था कि अपने दिल की बात कर के कहीं वो रीमा को किसी तकलीफ में ना डाल दे। दोनों को एकदूसरे से साथ वक़्त बिताना अच्छा लगता था, रीमा जब भी साकेत के साथ होती थी तो वो अपने टूटे दिल का दर्द भूल जाती थी, इसलिए वो साकेत के साथ काफ़ी वक़्त बिताती थी।

साकेत को उम्मीद थी कि रीमा उनके दिल का हाल खुद समझ लेगी और फिर वो दोनों एक हो जायेंगे। रीमा को भी ऐसा ही लगता था, पर आशीष के लिए। रीमा सोचती थी कि आशीष और वो फिर से एक हो जायेंगे। धीरे धीरे समय के साथ साकेत ने रीमा को इशारों इशारों में अपने दिल का हाल बताने का फैसला लिया, पर रीमा को तो जैसे साकेत में बस एक अच्छा दोस्त ही नज़र आता था। साकेत को भी पता था कि ये मामला रीमा के लिए काफी संवेदनशील है और हो सकता है कि रीमा उस से बात करना ही बंद कर दे, इस चक्कर में वो सीधा सीधा कुछ भी नहीं बोलता था।

साकेत एक मराठी लड़का था और रीमा थी पटना, बिहार से। हैना, कमाल की बात, फिर भी एकदूसरे के इतने अच्छे दोस्त थे वो, जो कि पुणे जैसे शहर में बहुत मुश्किल से देखने को मिलता है, पर वो जैसा कहते हैं ना, “इश्क़ कोई पाबंदियाँ नहीं मानता, कोई सीमा नहीं होती प्यार में” बस वैसे ही, हो गया था साकेत को भी। सब कुछ भुला के वो बस रीमा को बेपनाह चाहने लगा था।

वैसे पहले की बात करें तो साकेत बहुत ही मज़ेदार लड़का था, हमेशा खुश रहने वाला, दुसरो को खुश रखने वाला। एकदम मस्ती मज़ाक के मूड में रहने वाला। वहीं रीमा इस बात को लेकर काफी उत्साहित थी कि वो पटना से दूर पुणे जैसे अच्छे शहर में पढ़ने जा रही थी। दोनों ही एकदूसरे से काफी अलग थे, फिर भी एकदूसरे के इतने करीब और किस्मत तो देखो, दोनों फाइनल वर्ष के प्रोजेक्ट में एक ही ग्रुप में आ गए। अब तो वो पहले से भी ज्यादा साथ में वक़्त बिताने लगे, रीमा भी आशीष को अब भुला सी चुकी थी। अब तो रीमा भी मन ही मन साकेत को चाहने लगी थी। वक़्त और बीतता गया और रीमा का प्रेम साकेत के लिए और बढ़ता गया। अब तो हाल ये था कि रीमा से रहा न गया और उसने साकेत को सब बताने का फैसला किया।

रीमा ने साकेत को अकेले में ले जाकर सब बता दिया, साकेत बहुत ही खुश था पर वो उस पल का पूरा लुत्फ उठाना चाहता था और अपनी खुशी को दिल मे दबाकर रीमा की बातें सुनता रहा। फिर अचानक उसके सब्र का बांध टूट ही गया और वो बोला, अरे पगली! मैं तो बहुत पहले से ही तुमसे प्यार करता हूँ, पर बोल नहीं पाया कभी। आज तुमने ये बोल कर मुझपर बहुत बड़ा एहसान कर दिया है।

दोनों ही बहुत खुश थे पर यहाँ से उनकी ज़िंदगी और कठिन होने वाली थी ये उनको नहीं पता था। रीमा के पिताजी ने रीमा के लिए रिश्ता देखना शुरू कर दिया था, वहीं साकेत के लिए जो एक मराठी परिवार से था, ये और भी ज़्यादा मुश्किल काम था कि वो कैसे अपने घर वालो को रीमा के बारे में बताए। पर दोनों का प्यार बहुत सच्चा था तो वो दोनों तमाम मुश्किलों के बावजूद एकदूसरे के साथ खड़े रहे। आखिर दोनों के परिवारों ने उनके प्यार के सामने घुटने टेक ही दिए। आज दिनों शादी कर चुके हैं और एक खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

हाल-ए-दिल कहना था मुझे पर कह गयी वो,
जो दिल पहले से ही उसका था, उसे हक़ से ले गयी वो।