पहली डेट: कहानी दो दोस्तों की

सुहानी शाम थी, रितेश और तृप्ति एक दूसरे से साथ गोआ में समंदर किनारे बैठे थे। वो शाम उन दोनों के लिए बहुत खास थी। थोड़ी अलग, थोड़ी अजीब सी शाम, पर फिर भी प्यारी। समंदर की लहरों से आता हुआ पानी उन दोनों के पैरों को छूकर वापस चला जाता, पानी और उनके बीच का ये सिलसिला काफी देर तक चलता रहा।

रितेश और तृप्ति एक दूसरे के बहुत अच्छे दोस्त थे, वो साथ में, एक ही स्कूल, एक ही क्लास में पढ़ा करते थे। इसलिए उन दोनों की दोस्ती बहुत गहरी थी, दोनों एक दूसरे को समझते थे।

बीच पर बैठे दोनों बातें कर रहे थे, तभी:
रितेश बोला, ” तुतू, हम एकदूसरे को कितने सालों से जानते हैं, समझते हैं, बहुत अच्छा लगता है जब तुम और मैं ऐसे साथ में होते हैं, तुम्हें नहीं लगता कि अब हम सिर्फ दोस्त नहीं हैं, उस से थोड़ा बढ़कर हैं।”
तृप्ति ने बोला, ” आई नो डिअर! तुम बहुत खास हो मेरे लिए और मैं नहीं चाहती कि हमारा ये प्यारा से रिश्ता खराब हो।”
रितेश ने उसे समझाते हुए बोला,” अरे तुतू, समझो, हम न लड़ते हैं, न कभी एक दूसरे से बात किये रहते हैं और कुछ भी होता है तो वो बात तुम सबसे पहले मुझे बताती हो, है ना? इसका मतलब समझ रही हो न!”
तृप्ति बोली, ” हाँ, कुछ भी होता है तो मैं तुमसे ही शेयर करती हूँ, क्यूँकि तुम, अच्छे से समझते हो मुझे।”
“वही तो मैं कह रहा हूँ”, रितेश बोला।
तृप्ति थोड़ा सा शरमाई और हल्के से मुस्कुराते हुए बोली, “तो हमें क्या करना चाहिए?”

तृप्ति की मुस्कुराहट में रितेश को इकरार साफ दिख रहा था, दोनों ने डेट पर जाने का फैसला लिया। यूँ तो दोनों काफी बार एक दूसरे से साथ बाहर गए थे, पर दोस्तों की तरह। ये पहली बार था कि वो दोनों लवर्स की तरह डेट पर जाएँगे। अगला दिन आया, रितेश पहली बार तैयार होते समय घबरा रहा था, उसे पहली बार ये फिक्र हो रही थी कि वो अच्छा तो लग रहा है ना। बार बार अपने आप को शीशे में देख वो बालों पर हाथ फेरता और उन्हें ठीक करने लगता। तृप्ति का भी दिल ज़ोर ज़ोर से धडक रहा था, उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि वो क्या पहनें, कैसे तैयार हो। इस से पहले तो वो रितेश से मिलने यूँही आ जाय करती थी बिना ये फिक्र किये की वो कैसी लग रही है, क्या पहनी है, लेकिन आज के दिन उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि वो कैसे तैयार हो। जैसे तैसे उसने अपने दिल और दिमाग पर काबू पाया और तैयार होकर डेट वाली जगह पहुँच गयी।

जगह तृप्ति ने ही चुनी थी, उसे समंदर किनारे, बीच पर जाना बहुत अच्छा लगता था, इसलिए उसने ऐसा होटल चुना जो एकदम समन्दर किनारे था। वहाँ पहुंचकर वो समुद्र की लहरों की आवाज़ में खो गयी, आज उसे वो आवाज़ किसी मधुर संगीत से कम नहीं लग रही थी। इतने में रितेश भी आ गया और तृप्ति के सामने जाकर बैठ गया, तृप्ति इतनी खो गयी थी कि उसे रितेश के आने का पता ही नहीं चला। रितेश चुपचाप उसे देखता रहा, वो चाहता था कि ये पल यहीं रुक जाए और वो तृप्ति को ऐसे ही देखता रहे। तभी ज़ोर से ठंडी हवा आयी और तृप्ति का ध्यान तोड़ गयी। तृप्ति ने रितेश को अपने सामने देखा तो वो खड़ी हुई और रितेश के गले लग गयी। रितेश बोला, “सॉरी वो थोड़ा देर हो गयी…” “मेरे ऐसे ही पास रहो और इस पल को महसूस करो”, तृप्ति ने रितेश की बात काटते हुए कहा।

दोनों फिर एक दूसरे में ऐसे ही खोए रहे और वो पहली डेट उन्होंने अपने दोस्ती से लेकर प्यार तक के सफर के नाम कर दी।

वो सफर रेलगाड़ी का

बात है पिछले साल की दीवाली की, रोहित ने अपने काम से छुट्टी पहले ही ले ली थी। उसे दीवाली पर अपने घर जो जाना था। उसने सारी तैयारियां बहुत पहले से ही कर ली थीं जैसे रेलगाड़ी का रिज़र्वेशन, अपने बॉस से छुट्टी की बात, दीवाली के लिए नए कपड़े लेना इत्यादि। वो बेहद खुश भी था क्यूँकि वो बहुत सालों के बाद अपने घरवालों के साथ दीवाली मनाने जा रहा था।

सारी तैयारियाँ तो रोहित पहले से ही कर चुका था इसलिए अब उसे कुछ खास फिक्र करने की ज़रूरत नहीं थी। अपना सामान लेकर वो ऑटो में बैठ समय पर स्टेशन पहुँच गया। उसने स्टेशन पर लगी टेलीविजन पर देखा कि उसकी गाड़ी प्लेटफार्म न. 2 पर खड़ी हुई है। रोहित झटपट जाकर रेलगाड़ी में बैठ गया, उसे नीचे की सीट मिली थी, समान सीट के नीचे रख वो खिड़की से पास जाकर बैठ गया और रेलगाड़ी के चलने का इंतज़ार करने लगा। थोड़ी ही देर में रेलगाड़ी के इंजिन की आवाज़ रोहित के कानों में पड़ी और गाड़ी धीरे-धीरे चलने लग गई। रोहित बाहर के नज़ारों का लुत्फ लेने लग गया।

थोड़ी ही देर में एक लड़की हाँफते हुए आई और रोहित की सीट पर बैठ गयी। उसने खुद से ही बोला, “थैंक गॉड, आखिर जगह मिल ही गयी। लगा था आज तो ट्रैन मिस ही हो जाएगी।” रोहित ने उसकी ओर देखा तो वो बोली, “ये सीट आपकी है क्या?” रोहित ने बोला, “जी हाँ, तभी तो यहाँ बैठा हूँ।” लड़की बोली,” बढ़िया, मेरी वो सामने वाली ऊपर की सीट है। क्या में यहाँ बैठ सकती हूँ?” रोहित बोला, “जी हाँ, क्यूँ नहीं।” लड़की ने मुस्कुरा कर बोला, “शुक्रिया! आपका।” रोहित फिर रेलगाड़ी से बाहर झाँकने लगा। उस लड़की ने फिर बोला, “लो मैंने आपसे आपका नाम तो पूछा ही नहीं, क्या नाम है आपका?” रोहित ने उसे अपना नाम बताया और उससे उसका नाम पूछा। उस लड़की ने अपना नाम रिया बताया। नाम सुनकर रोहित बोला, “बहुत अच्छा नाम है आपका।” रिया ने हँसते हुआ कहा, “है ना! मुझे भी अपना नाम बहुत अच्छा लगता है।” रोहित ने उसकी ओर देखा और ज़रा सा मुस्कुरा दिया।

जैसे जैसे समय बीत ता गया रोहित को वो लड़की बहुत पसंद आने लगी। उसका बेबाक बोलने का अंदाज़, उसकी मुस्कराहट, उसका वो बालों को सहलाना। ये सब मन ही मन रोहित सोच ही रहा था कि रिया ने फिर बोली, “रोहित, सुनो दिल्ली अभी बहुत दूर है, मुझसे ऐसे चुपचाप बैठ कर सफर नहीं हो पाता।” रोहित बोला, ” तो कैसे किया जाता है सफर?” रिया बोली, कुछ बोलो, बात करो, अपने बारे में बताओ नहीं यो मेरा सुनो या कुछ खेलेते हैं। फिर रोहित ने कहा, “यहाँ इस रेलगाड़ी में और भी लोग हैं क्या पता उनको शांति से जाना हो” रिया बोली, “उनको या तुमको। खैर ठीक है, सुन तो सकते हो। मैं बताती हूँ आज ये ट्रैन मुझसे छूट ही जाती, चलती रेलगाड़ी में कभी चढ़े हो? नहीं चढ़े होंगे आज मैंने किया ये कारनामा।” और फिर रिया घंटो तक बोलती रही और रोहित उसे चुपचाप सुनता रहा। रोहित तो उसका बात करना बहुत अच्छा लग रहा था, रिया की आवाज़ इतनी प्यारी थी कि रोहित को सब अच्छा लग रहा था। वो तो खो ही गया था रिया की बातों में।

रिया को भी जैसे कोई सुनने वाला मिल गया, वो रोहित से बात करके बहुत अच्छा महसूस कर रही थी, क्यूँकि ऐसा पहली बार था कि उसे किसी ने बीच में टोका नहीं। जाने अनजाने में दोनों को एक सफर में हमसफर मिल जाएगा ये किसी ने भी नहीं सोचा था।

रास्ते मेरे सारे जाते हैं तेरी ओर ही,
जैसे उन्हें पता हो, तू ही मंज़िल है मेरी।

एक प्रेम कहानी ऐसी भी

साकेत और रीमा कॉलेज में एक ही क्लास में पढ़ते थे, कुछ ही समय में वो दोनों बहुत अच्छे दोस्त भी बन चुके थे। उन दोनों के विचार भी एक दूसरे से मिलते जुलते थे जैसे कि उनका रिलेशनशिप स्टेटस- ‘सिंगल’। जी हाँ, दोनों ही सिंगल थे। यूँ तो साकेत रीमा को चाहता था, ये उसका पहला पहला प्यार था, पर उसमें इतनी हिम्मत न थी कि वो अपने दिल की बात बता पाए।

लेकिन रीमा पहले सिंगल नहीं थी, इस कॉलेज में दाखिला लेने से पहले वो एक लड़के आशीष के साथ प्रेम संबंध में थी, हालाँकि, अब ऐसा नहीं था, अब रीमा, आशीष से अलग हो चुकी थी और ये बात साकेत को पता थी। इसलिए वो थोड़ा हिचकिचाता था अपने दिल का हाल बताने से। उसे लगता था कि अपने दिल की बात कर के कहीं वो रीमा को किसी तकलीफ में ना डाल दे। दोनों को एकदूसरे से साथ वक़्त बिताना अच्छा लगता था, रीमा जब भी साकेत के साथ होती थी तो वो अपने टूटे दिल का दर्द भूल जाती थी, इसलिए वो साकेत के साथ काफ़ी वक़्त बिताती थी।

साकेत को उम्मीद थी कि रीमा उनके दिल का हाल खुद समझ लेगी और फिर वो दोनों एक हो जायेंगे। रीमा को भी ऐसा ही लगता था, पर आशीष के लिए। रीमा सोचती थी कि आशीष और वो फिर से एक हो जायेंगे। धीरे धीरे समय के साथ साकेत ने रीमा को इशारों इशारों में अपने दिल का हाल बताने का फैसला लिया, पर रीमा को तो जैसे साकेत में बस एक अच्छा दोस्त ही नज़र आता था। साकेत को भी पता था कि ये मामला रीमा के लिए काफी संवेदनशील है और हो सकता है कि रीमा उस से बात करना ही बंद कर दे, इस चक्कर में वो सीधा सीधा कुछ भी नहीं बोलता था।

साकेत एक मराठी लड़का था और रीमा थी पटना, बिहार से। हैना, कमाल की बात, फिर भी एकदूसरे के इतने अच्छे दोस्त थे वो, जो कि पुणे जैसे शहर में बहुत मुश्किल से देखने को मिलता है, पर वो जैसा कहते हैं ना, “इश्क़ कोई पाबंदियाँ नहीं मानता, कोई सीमा नहीं होती प्यार में” बस वैसे ही, हो गया था साकेत को भी। सब कुछ भुला के वो बस रीमा को बेपनाह चाहने लगा था।

वैसे पहले की बात करें तो साकेत बहुत ही मज़ेदार लड़का था, हमेशा खुश रहने वाला, दुसरो को खुश रखने वाला। एकदम मस्ती मज़ाक के मूड में रहने वाला। वहीं रीमा इस बात को लेकर काफी उत्साहित थी कि वो पटना से दूर पुणे जैसे अच्छे शहर में पढ़ने जा रही थी। दोनों ही एकदूसरे से काफी अलग थे, फिर भी एकदूसरे के इतने करीब और किस्मत तो देखो, दोनों फाइनल वर्ष के प्रोजेक्ट में एक ही ग्रुप में आ गए। अब तो वो पहले से भी ज्यादा साथ में वक़्त बिताने लगे, रीमा भी आशीष को अब भुला सी चुकी थी। अब तो रीमा भी मन ही मन साकेत को चाहने लगी थी। वक़्त और बीतता गया और रीमा का प्रेम साकेत के लिए और बढ़ता गया। अब तो हाल ये था कि रीमा से रहा न गया और उसने साकेत को सब बताने का फैसला किया।

रीमा ने साकेत को अकेले में ले जाकर सब बता दिया, साकेत बहुत ही खुश था पर वो उस पल का पूरा लुत्फ उठाना चाहता था और अपनी खुशी को दिल मे दबाकर रीमा की बातें सुनता रहा। फिर अचानक उसके सब्र का बांध टूट ही गया और वो बोला, अरे पगली! मैं तो बहुत पहले से ही तुमसे प्यार करता हूँ, पर बोल नहीं पाया कभी। आज तुमने ये बोल कर मुझपर बहुत बड़ा एहसान कर दिया है।

दोनों ही बहुत खुश थे पर यहाँ से उनकी ज़िंदगी और कठिन होने वाली थी ये उनको नहीं पता था। रीमा के पिताजी ने रीमा के लिए रिश्ता देखना शुरू कर दिया था, वहीं साकेत के लिए जो एक मराठी परिवार से था, ये और भी ज़्यादा मुश्किल काम था कि वो कैसे अपने घर वालो को रीमा के बारे में बताए। पर दोनों का प्यार बहुत सच्चा था तो वो दोनों तमाम मुश्किलों के बावजूद एकदूसरे के साथ खड़े रहे। आखिर दोनों के परिवारों ने उनके प्यार के सामने घुटने टेक ही दिए। आज दिनों शादी कर चुके हैं और एक खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

हाल-ए-दिल कहना था मुझे पर कह गयी वो,
जो दिल पहले से ही उसका था, उसे हक़ से ले गयी वो।

 

पहला प्यार: नया एहसास, वो प्यार भरी बातें

पहला प्यार, नया एहसास, वो प्यार भरी बातें,
तेज़ धड़कनें, थोडी घबराहट और महबूब की यादें।

रात को देर से सोना, फिर भी जल्दी उठ जाना,
बैठे बैठे यूँही, सोचकर कुछ बेमतलब मुस्कुराना।

ना खाने की फिक्र ना लगता किसी काम में मन,
मेहबूब से मिलते ही खिल जाता सारा बदन।

घंटों सब भुलाकर, करनी ढेर सारी बातें,
करवटें बदल-बदल कर कटतीं दोनों की रातें।

रास्ते सारे जाते हैं फिर माशूक़ की ओर,
मन ही मन जैसे बांध ली हो उससे कोई डोर।

दिन लगे अधूरा सा जिस दिन न मिल पाना हो,
ज़िन्दगी से उस इस दिन को जैसे भुलाना हो।

हर चीज़ होती है प्यारी पहले प्यार की,
हमेशा दिल में रहती हैं तसवीरें उस यार की।

कबीर का कंपनी में आखिरी दिन – भाग 2

आगे पढ़ने से पहले भाग 1 को ज़रूर पढ़ लें।

अब हाल ये था कि उस लड़की को भी पता चल गया था कि कबीर जानकर उसी समय पर कैंटीन जाता है जब उस लड़की का जाने का समय होता है। आज की तारीख है 5 अप्रैल, यानी कल कबीर को कंपनी से अलविदा कहना है। कबीर की बेचैनी देख मैंने सोचा कि उसकी थोड़ी मदद की जाए। हम हमेशा की तरह रोज़ शाम को खाने गए और एक साथ लिफ्ट से ऊपर आ रहे थे, तभी लिफ्ट में मैंने जानबूझकर ऊंची आवाज में कहा, “भाई कबीर, कल तेरा इस कंपनी में आखिरी दिन है, कमी महसूस होगी तेरी। तू मुझे फ़ेसबुक पर फ़्रेंड रिक्वेस्ट भेज ताकि हम हमेशा संपर्क में रहे और हाँ, व्हाट्सएप करते रहना।”

मेरी कोशिश थी कि शायद वो लड़की भी फ़ेसबुक देखे और कबीर का काम बन जाये। हर दिन की ही तरह आज भी पर उस लड़की ने कबीर को फेसबुक पर दोस्त ना बनाया। कबीर अब निराश हो चुका था, मैंने उसे समझाया कि जल्दबाजी में कोई गलत फैसला मत ले लेना।

आखिर फिर वो दिन आ ही गया जब कबीर को हम सबको अलविदा कहना था। 6 अप्रैल का दिन, पर कबीर को उस लड़की के अलावा जैसे कुछ याद ही नहीं । मैंने सुबह कबीर को बोला कि आज 10 बजे कंपनी में मिलते हैं। मैं 10 बजे कंपनी पहुँच गया और कबीर का इंतज़ार करने लगा। काफ़ी देर के बाद भी जब कबीर न आया तो मैंने उसे फ़ोन किया, पर उसका जवाब ही नहीं आया। फ़िर थोड़ी देर बाद कबीर आया और बोला यार आज जल्दी जल्दी में फ़ोन घर पर ही रह गया। आज ही उसे फ़ोन की सबसे ज्यादा ज़रूरत थी और वो आज ही भूल गया। मैंने उससे पूछा कि कैसे वो अपना फ़ोन भूल गया। कबीर बोला, “यार आज मुझे उस लड़की से बात करनी थी तो सोचा अच्छी वाली कमीज़ पहन के आऊँगा। मैंने कमीज़ निकाली और उसे इस्त्री करने लग गया, इतने में ही मेरे घर से फ़ोन आ गया तो फ़ोन पे बात करते करते ध्यान ही नहीं रहा और कमीज़ जल गई। फिर जल्दी जल्दी में दूसरी कमीज़ पहनी और आ गया, इसी बीच मोबाइल घर पर ही रह गया।”

मैंने कबीर से बोला कि जाने दे अब भूल गया तो भूल जा अब इस बात को भी और हम दिनों नाश्ता करने चले गए। जैसे ही हम वापस आए तो कबीर से रहा न गया और उसने उस लड़की को स्काईप पर पिंग कर दिया।

कबीर ने बोला, “हेलो”
उस लड़की ने जवाब दिया, “हाय।”
कबीर बोला, “मुझे तुम से बहुत ज़रूरी बात करनी है”
लड़की बोली, “हम एकदूसरे को जानते भी नहीं हैं, क्या बात करनी है तुमको।”
कबीर बोला, “मेरा नाम कबीर है, अब तो तुम जान गई मुझे।”
लड़की बोली, “वाह! बहुत अच्छा।”
कबीर ने बोला, “पाँच मिनट के लिए मिल लो एक ज़रूरी बात करनी है”
लड़की बोली, “ओके, मिलते हैं।

दोनों ने कैंटीन में मिलने का फैसला लिया। दोनों कैंटीन पहुंचे तो कबीर ने उस लड़की से बोला कि मुझे गलत मत समझना, पर मैंने तुमको पहली बार इसी कैंटीन में देखा था, और तब से मुझे तुमसे जान पहचान बढ़ानी थी, पर डर लगता था कि तुम कहीं गलत न समझ लो। मैं कोई बुरा लड़का नहीं हूँ ना ही मैं तुमको कोई तकलीफ पहुँचना चाहता हूँ। मैंने तुमको फेसबुक पर भी दोस्त बनाना चाहा पर तुमने शायद देखा ही नहीं। लड़की ने बोला कि वो सोशल मीडिया से दूर ही रहना पसंद करती है और वो कबीर को अच्छे से जानते भी नहीं हैं, इसलिए ध्यान नहीं दिया फेसबुक पर। कबीर ने बोला कि इसलिए तो मुझे तुमसे मिलना था ताकि हम दोनों एकदूसरे को अच्छी तरह जान पाए। लड़की ने कबीर को नई नौकरी की बधाइयाँ दी और वहाँ से चली गयी।

कबीर अभी भी दुविधा में था कि उसके साथ ये आखिर हुआ क्या, उसे ये नहीं समझ आया कि अब वो क्या करे। वो भी ऊपर पाँचवे माले पर आ गया। हम लोग भी तब तक केक लेकर आ चुके थे, कबीर को अलविदा जो कहना था। सबने मिलकर कबीर के बारे में अपने अपने विचार व्यक्त किए और उसे बताया कि उसकी कमी खला करेगी। कबीर भी थोड़ा भावुक हो गया था और बोला कि ये तीन साल उसकी ज़िन्दगी में बहुत मायने रखते हैं और वो इनको कभी नहीं भूल पाएगा। कबीर ने अपना आई-कार्ड जमा कर दिया था तो अब वो कंपनी में नहीं आ सकता था। कबीर के पास अब कोई रास्ता नहीं था, उसे लगा अब शायद वो उस लड़की से आगे कभी ना मिल पाए।

कबीर फिर अपने घर चला गया, घर जाकर उसने अपना मोबाइल देखा तो बहुत सारे मिस्ड कॉल्स और नोटिफिकेशन थे, पर उसकी नज़र फ़ेसबुक से आए उस नोटिफिकेशन पर रुक गयी जिसमे उस लड़की ने कबीर की फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर ली थी। वो इतना खुश हुआ कि रुक ना पाया और तुरंत मुझे फ़ोन कर के अपनी खुशी जाहिर की। उसकी बातें सुन कर मुझे भी सुकून मिला कि जाते जाते उसके साथ कुछ तो अच्छा हुआ।

वो जैसे शाहरुख ने कहा था कि, “अगर किसी चीज़ को दिल से चाहो तो पूरी कायनात उसे तुमसे मिलाने की कोशिश में लग जाती है।” बस ऐसी ही कुछ थी कबीर की ये कहानी भी।

 

कबीर का कंपनी में आखिरी दिन – भाग 1

आखिरी दिन यानी 6 अप्रैल, मेरा दोस्त और सहकर्मी जिसका नाम कबीर है, कंपनी में उसका आखिरी दिन था। आगे की बात बताने से पहले हम कुछ दिन पीछे चलते हैं, जहाँ से ये किस्सा शुरू हुआ था।

तो आज से कुछ 10 दिन पहले, जब हम सब शाम को खाने के लिए कैंटीन में गए तो हमने खाने के लिए आलू के पराठे लिए और खाने बैठ गए। थोड़ी देर बाद कबीर को एक लड़की नज़र आई, कबीर को उसे देखते ही न जाने क्या हो गया और वो बोला, “मुझे तुम लोगों की भाभी मिल गयी।” हमने पूछा, “कौन? कहाँ?” तो कबीर ने बोला, “वो देखो वहाँ, लाल रंग के कपड़ों में जो खड़ी है।” सबने एक साथ उस ओर देखा तो कबीर ने बोला, “अरे मरवाओगे क्या तुम लोग, एक एक कर के देखो।” देखा तो पता चला कि लड़की दिखने में बहुत खूबसूरत थी। कबीर ने बोला मुझे कैसे भी इस से बात करनी है। कबीर को पहली नज़र में ही उस लड़की से प्यार हो गया था।

हम जिस कंपनी के लिए काम करते हैं, वहाँ कबीर पिछले तीन सालों से काम कर रहा था, तो उसे लगभग सभी लोग जानते थे। उसने अपनी पहचान का फायदा उठाया और उस लड़की का नाम पता कर लिया। घर जाकर कबीर ने फ़ेसबुक पर उसे ढूंढने की कोशिश की, काफी कोशिश के बाद आखिर उस लड़की का प्रोफाइल कबीर को मिल ही गया। उसने तुरंत उसे फ़्रेंड रिक्वेस्ट भेज दी। अगले दिन हम सब फिर कंपनी आए, कबीर का काम में मन ही नहीं लग रहा था। उसे लग रहा था कि उसके पास वक़्त बहुत कम है क्यूंकि कुछ ही दिनों में वो कंपनी छोड़कर जाने वाला था।

शाम को हम फिर कैंटीन में गए, वो लड़की वहाँ पर ही थी। कबीर का ध्यान खाने और हमारी बातों से हट गया और वो उस लड़की को ही देखता रहा। कबीर के लिए तो मानो वक़्त थम सा गया था। फिर थोड़ी देर बाद वो बाहर जाने लगी तो कबीर ने भी हम सभी को बोला, ” चलो उठो, कितना टाइम यहाँ बैठोगे।” हम भी वहाँ से उठकर चल दिए। कैंटीन दूसरे माले पर थी और हम सब पाचवें माले पर काम करते थे। कबीर उस लड़की के पीछे था और हम सब कबीर के। सब लॉबी में लिफ्ट के आने का इंतज़ार करने लगे। लिफ्ट आई तो वो लड़की अपनी सहेलियों के साथ जाने लगी, हम सब भी उसी लिफ्ट में घुस गए। कबीर की नजरें उस लड़की पर ही थीं, पर उस लड़की ने कबीर को एक बार भी नहीं देखा।

अब हम सबकी दिनचर्या यही होने लगी, शाम का इंतज़ार, कैंटीन में बैठना और फिर साथ में ऊपर आ जाना। कबीर की बात आगे बढ़ ही नहीं रही थी। कबीर को कुछ न कुछ जल्दी ही करना था, पर कंपनी में इतना समय नहीं मिल पाता था कि वो कुछ कर पाए और फ़ेसबुक पर उस लड़की ने कबीर की रिक्वेस्ट एक्सेप्ट ही नहीं कि थी। कबीर ने सोचा कि उसे कुछ अलग करना ही पड़ेगा वर्ना वो उस लड़की से कभी बात नहीं कर पाएगा।

~ क्रमश.

भाग २

वड़ा पाव

कुछ कुछ किस्से आपकी ज़िंदगी में ऐसे होते हैं कि जब भी आप उनको याद करते हो, बस मुस्कुरा देते हो। ऐसा ही एक किस्सा गणेश के साथ भी हुआ। बात तब की है जब गणेश मुंबई से पुणे आ रहा था, शाम का समय था और हल्की सी ठंड भी थी। गणेश जिस कैब से आ रहा था उसमें उसके साथ एक लड़की भी थी, दोनों ने कैब शेयर की थी। अभी तक तो गणेश को उस लड़की का नाम भी पता नहीं था। 

लड़की देखने में गणेश को बहुत सुंदर लगी। काले लंबे बाल, गेहुँआ सा रंग, बड़ी-बड़ी काली आँखें। गणेश भी गोरा, अच्छी कद काठी का था। जैसे जैसे कैब आगे जा रही थी वैसे वैसे गणेश उस लड़की से बात करने के लिए आतुर हो रहा था, पर उसे डर भी था कि कहीं उसे बुरा ना लगें। अजीब सी कश्मकश से जूझ रहा था गणेश।

लोनावला के आस पास ड्राइवर ने एकदम से कैब को रोका और जल्दी से उतर कर आगे वाले टायर की जाँच की। “साहब, तैयार गेला”, ड्राइवर ने बोला। गणेश ने भी उतर कर देखा तो टायर पंचर था, गणेश ने ड्राइवर से पूछा अब क्या करना है तो इस पर ड्राइवर बोला कि मेरे पास एक और टायर पड़ा हुआ है, ड्राइवर टायर के काम में लग गया।

ठंडी हवा, शाम और लोणावला का नज़ारा, गणेश एक तरफ जाके नज़ारे का लुत्फ उठाने लगा। तभी पीछे से वो लड़की आयी और बोली बहुत अच्छा मौसम है। गणेश ने मुड़कर देखा, उसके चेहरे पर मुस्कुराहट जैसे चिपक ही गई थी। वो बोला हाँ बहुत, तभी तो इतने अच्छे मौसम में इतना अच्छा नज़ारा देखने यहाँ आ गया। कितना खूबसूरत है प्रकृति का ये दृश्य। मुझे भी ऐसी जगह बहुत पसंद हैं, उस लड़की ने बोला। ये सुनकर गणेश ने उस लड़की से बोला, “एक बात बताऊँ, बुरा मत समझना” लड़की बोली, “अरे! नहीं नहीं, बोलिए” गणेश ने उसे अपने दिल की सारी बात बता दी कि वो उस लड़की से बात करना चाह रहा था, उसे वो अच्छी लगने लगी थी और न जाने क्या क्या। अपने दिल की पूरी किताब खोल कर रख दी गणेश ने।

लड़की थोड़ा शरमाते हुए बोली,” प्रिया! मेरा नाम प्रिया है, तुम पूछना चाहते थे ना!” गणेश की खुशी का ठिकाना ही न रहा और वो बोला कि मेरा नाम गणेश है प्रिया। फिर गणेश ने प्रिया से बोला कि जब तक कैब का काम चल रहा है, हम कुछ खा लें? वहाँ एक ढाबा सा दिख रहा है, चलोगी? चलो, भूख तो लगी है हल्की हल्की, प्रिया ने बोला। ड्राइवर को बता के वो दोनों उस ढाबे की तरफ चल दिए और एकदूसरे को अपने बारे में बताने लगे। वहाँ पहुंच कर गणेश ने प्रिया से पूछा कि क्या खाओगी? चाय और वड़ा पाव, ऐसे मौसम में तो यही सबसे अच्छा लगता है मुझे, प्रिया बोली।

ये सुनकर गणेश और भी खुश हो गया, वो बोला, “मुझे लगा था तुम बर्गर या पिज़्ज़ा बोलोगी” ना ना ऐसे मौसम में तो वडा पाव की बात ही कुछ और होती है, ” प्रिया ने बोला। गणेश ने प्रिया को बताया कि उसे भी चाय के साथ वड़ा पाव बहुत पसंद है। और दोनों हँसने लगे।

ये था वड़ा पाव का किस्सा, जिसने गणेश और प्रिया को और करीब ला दिया।

Wada Pav with Tea